विजयादशमी की शुभकामनाएं

जीवन में दीपावली जैसा उत्साह चाहिए तो आपके जीवन में विजयदशमी जैसा पर्व भी होना चाहिये...... विजयदशमी जैसा पर्व आपके जीवन में हो तो  अपने शक्ति सामर्थ्य के बारे में आत्म चिंतन औऱ उसे बढ़ाने के उपाय वाली नवरात्र भी होनी चाहिए..... उसके साथ आपको अपने पूर्वजों का, अपने इतिहास का ज्ञान भी होना चाहिए...क्योंकि इतिहास की सीख आपकी जय में बहुत महत्वपूर्ण होती है.... यही तो है जीवन का सच।


 

इसीलिए पहले श्रद्धा से भरे श्राद्ध के दिन.... फिर नवरात्र, विजयादशमी और फिर दीपावली ......और दीपावली में भी पहले आरोग्य,धन ( धन त्रयोदशी)फिर रूप  स्वयं का भी और समाज का भी ( रूप चतुर्दशी-नरक चतुर्दशी )और फिर दीपावली ।
दीपावली केवल आपके लिए नहीं .... सबके लिए .... सबके घर धन,सब के घर खुशियों की दीवाली ....इसके बाद प्रकृति पूजा अर्थात गोवर्धन पूजन....आपसी सद्भाव की रामा श्यामा....भारतीय परंपराएं ऐसे ही नहीं बनी..... कि किसी ने अचानक सोचा और उसने तय कर दी.....  365 दिन का विचार हुआ है.... हर चीज का क्रम है ।
आज मैं गूगल पर देख रहा था श्री लंका से अयोध्या की दूरी 20 दिन से अधिक बताते हैं पैदल की.... और हमारे दशहरा से दीपावली की दूरी भी 21 दिन .....दीपावली  आती है।
 हम आज के साइंस के नजदीक  हैं ....हमारे यहां कहा गया कि 8400000 योनियों है और अभी जो नए साइंस के शोध आ रहे हैं उनके अनुसार लगभग 79 लाख जीव जंतुओं की पुष्टि होती हैं .....उसी प्रकार हमारे से सूर्य की दूरी का अनुमान भी लगभग उतना ही है,जितना हनुमान चालीसा में वर्णित है.....खैर हम सब इन पर्वों को मनाते हैं।
इन पर्वों के पीछे छुपे हुए मर्म को पहचाने.... जीवन में विजयदशमी जैसा उत्सव लाना है तो हमें राम को जीवन में उतारना होगा.... तो राम के चरित्र को समझना पड़ेगा। राम अपने परिवार को एकजुट रखने की कोशिश करने वाले एक महामानव.... बहु पत्नी प्रथा के कारण अपनी मां की पीड़ा देखकर पूरे जीवन एक पत्नी का संकल्प लेने वाले जीवट के धनी राम.... राजपाट मिलते मिलते वनवास की घोषणा पर मुस्कुराते हुए राम.... वनपथ में जाते हुए निषाद,केवट को गले लगाने वाले राम.... बिना किसी की सहायता अपने पुरुषार्थ पर भरोसा करते राम..... जिस भरत को राजपाट मिल गया उसकी भी चिंता करते राम.... अपनी जय के लिए साधन की सुचिता की खातिर बाली को मारकर सुग्रीव का साथ देते राम.... लंका के प्रतापी राजा रावण से अपनी पत्नी को लाने के लिए लड़ते हुए....छोटे भाई को खोने के डर से विलाप करते राम....  हमारे जीवन में भी ऐसे पल आते, जब हमें राम सा चरित्र निभाने का अवसर मिलता है ......पर क्या हम निभा पाते हैं ?
क्षणिक लाभ के लिए रिश्तो को तार-तार करते हुए नजर आते हैं.....बहन भाई पर संपत्ति के लिए मुकदमा करती है ....भाई भाई आपस में हथियार उठाकर लड़ने लग जाते है....बूढ़े मां बाप वृद्ध आश्रम में जाने को मजबूर है......तो कई जगह पड़ोसियों के बहकावे में आकर बूढ़े मां बाप अपने बेटों को संपत्ति से बेदखल करते हुए नजर आते हैं..... अपने से नीचे जीवन यापन करने वालों को कुछ न समझने वाले हम लोग राम जी को तो मानते हैं पर उन राम जी के जीवन में केवट निषाद को गले लगाने वाले दृष्टांत से कुछ नहीं सीखते......... अपनी जय के लिए सब कुछ करने का तैयार हो जाते हैं भले ही वह सही पथ हो या असत्य का ....दामन थामना पड़े ......फिर भूल जाते हैं,जिन श्रीराम को मानते हैं उन्होंने सुग्रीव की मित्रता स्वीकारी थी बाली की नहीं ।
.....और जब बाली ने कहा कि प्रभु !हम तो दोनों ही आपके लिए समान थे फिर आपने सुग्रीव को प्रिय माना और मुझे मारने का कारण बताइए ?
भगवान राम कहते हैं कि बहन, पुत्र वधू ,भाई की पत्नी ,पुत्री के समान ही होती है,अर्थात चारों ही पुत्री होती है तुमने क्या किया ?आज क्या हम सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस भी कर पाते हैं ? हम उस व्यक्ति का साथ देते हैं जिससे हमें फायदा होता है...यदि हम राम होते तो हम बालि का साथ देना पसंद करते पर इसलिए हम राम नहीं है .....इसका कारण यह है कि हम राम जैसा सामर्थ्य अपने अंदर प्रकट नहीं कर पा रहे हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम यूं ही नहीं हो गए  श्रीराम....जीवन के अपने संकल्पों पर चलने का साहस करने वाला ही मर्यादा पुरुषोत्तम होता है .....और समाज की हर चीज को स्वीकार करने का सामर्थ्य उनमें था ।
अपने यज्ञ में कहा गया, समाज की मान्यता के अनुसार कि पत्नी साथ होनी चाहिए तो वह भगवान थे ,इसलिए किसी को दरकिनार नहीं कर सकते थे.... उन संस्कारों का पालन किया .....पत्नी साथ नहीं थी तो मूर्ति लगवाई.... समाज के नियम सबके लिए बराबर है चाहे वे राजा हैं या भगवान हैं या अवतार हैं इसलिए .....उनको छूट नहीं दी जा सकती ..... मर्यादा पुरुषोत्तम राम ....राजा भी थे,राजा का धर्म था उनके निजी जीवन पर भी जब किसी ने सवाल उठाया तो अपने निजी जीवन को भी क्योंकि वे सार्वजनिक जीवन में थे इसलिए अपनी पत्नी जगत जननी जानकी को वाल्मीकि के आश्रम में भेज दिया और उसके बाद का पूरा जीवन स्वयं बनवासी राम की तरह ही बिताया ।
राजमहल में रहना अलग था और बिछोना वही घास फूस.... राज सिंहासन पर बैठने के अलावा इतना समय एकांत में उसी तरह व्यतीत करते थे जैसे माता जानकी बाल्मीकि आश्रम में क्या हम कर सकते हैं?
मनमुटाव में ही पत्नी अपने पीहर चली जाए अब हम क्या करते हैं ? उसकी आलोचना ....उसके बारे में कहानियां बनाते हैं ....और पत्नी है तो क्या करती है ? पति के बारे में कहानियां बनाती है ..।....और हम राम की आराधना करते हैं ?
राम के जीवन एक पल ...एक क्षण....एक दृष्टांत....अपने जीवन में उतार लीजिए आपकी विजय निश्चित है .....आपके जीवन में भी विजयादशमी जैसा उत्सव होगा .....आपके जीवन में भी दीपावली की जगमगाहट होगी..... धन की वर्षा होगी,आरोग्य होगा, रूप होगा,सामाजिक समरसता वाली पहचान होगी....
विद्वता में रावण का कोई सानी नहीं था,चारों वेदों के बारे में सब कुछ जानता था ...ज्योतिष का प्रकांड विद्वान था ....जल प्रबंधन के मामले में उसका कौशल्य अपने आप में प्रेरक है .....फिर भी एक अहंकार ने .....एक नारी के अपमान ने .....उसकी विशेषताओं के बजाय एक पापी के रूप में सामने ला दिया और जीवन पर्यंत त्याग करने वाले, वंचितों को साथ लेकर सुविधा संपन्न ,विद्वान महारथी लंकेश से युद्ध करने वाले तपस्वी श्री राम को भगवान बना दिया ।


आइए इस विजयादशमी अपने अहंकार का रावण ....सब कुछ मैं ही  पा लूं की इच्छा .....सबसे बड़ा मैं .....मैं जो कहूं वही सही.... मैं सबसे बड़ा .....मेरा किसी से सहकार नहीं, सरोकार नहीं पर सब मेरे अनुचर है इस भाव का रावण जलाएं।
 संकल्प लें जीवन को राममय बनाने की सद इच्छा का..... और अपने जीवन के दीपोत्सव की ओर कदम बढ़ाइए।
।।शिव।।
विजया दशमी २०७६